भक्त के वश में है भगवान श्री बांके बिहारी लाल की सच्ची कहानी

भक्त के वश में है भगवान: बड़ी मनोरम कथा है हृदय से पढ़े..

भक्त के वश में है भगवान:

एक पंडितजी थे वो श्री बांके बिहारी लाल को बहुत मानते थे। सुबह शाम बस ठाकुर जी का गुणगान करते रहते थे। पारिवारिक समस्या होने के कारण उन्हें कुछ धन की आवश्यकया हुइ तो वो सेठ जी के पास धन लेने चले गए। सेठ जी ने धन तो दे दिया लेकिन उसको लौटाने की बारह किश्त बाँध दी। पंडित जी ने ये स्वीकार किया अब धीरे-धीरे पंडितजी ने 11 किश्त भर दी लेकिन एक किश्त न भर सके।भक्त के वश में है भगवान

12वी किश्त निकल जाने पर सेठ जी ने पंडितजी पर पुरे धन का मुकदमा कर दिया। कोर्ट कचहरी हो गयी जज साहब बोले पंडित जी आपकी तरफ से कौन गवाही देगा। इस पर पंडित जी बोले मेरे बांकेबिहारी लाल गवाही देंगे कोर्ट में मौजूद सभी लोग ठहाके मार कर हसने लग गए। गवाही की तारीख तैय हो गयी। पंडित जी ने अपनी अर्जी ठाकुरजी के श्री चरणों में लिख कर रख दी। अब गवाही का दिन आया वकील अपनी दलीले पेश कर रहा था। पंडितजी को अपने ठाकुरजी पर पूरा भरोसा था। जज ने कहाँ पंडित जी अपने गवाह को बुलाओ पंडितजी ने श्री चरणों में ध्यान लगया और तभी वहां एक वृद्ध व्यक्ति आया।उसने पंडितजी  के पक्ष में गवाही दी। वृद्ध की दलीले सेठ के बहीखाते से मेल खाती थी। पंडितजी को सम्मान से रिहा कर दिया तभी जज साहब बोले की पंडित जी ये वृद्ध व्यक्ति कौन है तो पंडित जी बोले अरे जज साहब ये ही तो मेरे ठाकुर जी है। इतना सुन्ना था और जज पंडित जी के चरणों में लेट गया और बोलै मुझे ठाकुर जी का पता बताओ। पंडितजी बोले ठाकुर जी तो हर जगह विद्यमान है।

जज ने घर-बार सब त्याग दिया और ठाकुर जी को ढूंढने निकल गया सालो बीत गए पर ठाकुर न मिला अब जज पागल सा मैला कुचैला हो गया। वह भण्डारो में जाता लोगो की जूठन खाता और अपने ठाकुर जी को खिलता। ये देख कर सब लोग उसके खिलाफ हो गए उसे मरने पीटने लग गए। एक भंडारे में लोगो ने जूठन नहीं छोड़ी ताकि वो ठाकुरजी को जूठा न खिला सके। लेकिन फिर भी उसने पौंछ-पांछकर निवाला इकट्ठा किया और खुद खा गया। उसे याद आया की वो ठाकुर जी को तो खिलाना भूल ही गया।

उसके निवाला अंदर नहीं गया उसने ठाकुर जी का ध्यान लगाया तभी वहां सुन्दर ललाट चेहरा लिए हुए बाल-गोपाल स्वरुप में बच्चा पागल जज के पास आया और बोला क्यों जज साहब मेरा भोजन कहाँ है। जज साहब मन ही मन गोपाल छवि निहारते हुए अश्रु धरा  के साथ बोले ठाकुर बड़ी गलती हुए आज जो पहले तुझे भोजन ना करा सका। तो बाल गोपाल बोले के जज तू इतना पागल हो गया है मुझे लोगो का जूठन खिलता है। चल निकाल निवाला अपने मुँह से आज मै तेरी जूठन खाऊंगा। जज की आँखों से अश्रु धरा बहने लगी और वो मेरा ठाकुर मेरा ठाकुर कहता हुआ बाल गोपाल के चरणों में गिर पड़ा और वही देह त्याग दिया और मित्रो वो पागल जज और कोई नहीं वहीँ (पागल बाबा) है जिनका विशाल मंदिर आज वृन्दावन में स्थित है।

भाव के भूखे है प्रभु…और भाव ही एक सार है… और भावना से जो भेजे… तो भव से बेडा पार है।

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